ओंकारेश्वर और आदिगुरु शंकराचार्य

ओंकारेश्वर और आदिगुरु शंकराचार्य

ओंकारेश्वर और आदिगुरु शंकराचार्य – गुरु की खोज की पावन कथा

एक यात्री की नजर से ओंकारेश्वर

नर्मदा तट पर स्थित ओंकारेश्वर की यात्रा अपने आप में अद्भुत अनुभव है। जब मैं वहाँ पहुँचा, तो केवल ज्योतिर्लिंग ही नहीं बल्कि इसकी अनगिनत पौराणिक और ऐतिहासिक कथाएँ मन को छू गईं। उनमें से सबसे प्रेरणादायक कथा है आदि गुरु शंकराचार्य की, जिन्होंने बाल्यावस्था में ही ज्ञान और अध्यात्म की अद्वितीय राह पकड़ ली थी।


बालक शंकर और गुरु की खोज

आदि शंकराचार्य का जन्म केरल में हुआ था। बचपन से ही उनका मन अध्यात्म की ओर झुका हुआ था। वे केवल आठ वर्ष की आयु में ही संन्यास लेना चाहते थे। लेकिन परंपरा यह थी कि संन्यास के लिए एक योग्य गुरु की आवश्यकता होती है।

अपने गुरु की तलाश में वे दक्षिण से यात्रा करते हुए नर्मदा तट पर स्थित ओंकारेश्वर पहुँचे। कहते हैं कि नर्मदा की पवित्र धारा और ओंकार पर्वत का अद्भुत दृश्य उन्हें यहीं खींच लाया।


ओंकारेश्वर की गुफा और गुरु गोविंद भगवत्पाद

ओंकारेश्वर में आज भी एक पवित्र गुफा है जिसे गोविंद गुफा कहा जाता है। इसी गुफा में शंकराचार्य को उनके जीवन के महान गुरु – गोविंद भगवत्पाद मिले।

कथा है कि जब शंकराचार्य गुफा में पहुँचे, तब वे ध्यानमग्न गुरु के पास जाकर प्रणाम करते हुए बोले –
“गुरुदेव! मुझे ज्ञान दीजिए, मुझे मोक्ष के मार्ग पर चलना है।”

गोविंद भगवत्पाद ने पहले शंकराचार्य की परख की। उन्होंने कठिन प्रश्न पूछे और तपस्या के नियम बताए। बालक शंकर ने सहज उत्तर दिए और अपनी अद्भुत प्रतिभा से गुरु का हृदय जीत लिया।


ज्ञान की दीक्षा

गोविंद भगवत्पाद ने शंकराचार्य को वेद, उपनिषद, शास्त्र और अद्वैत वेदांत का रहस्य सिखाया। यहीं से शंकराचार्य को जीवन की नई दिशा मिली।

कहा जाता है कि एक बार नर्मदा नदी में भीषण बाढ़ आई। उस समय शंकराचार्य ने अपने कमंडल में पूरा नर्मदा जल समेट लिया और गुरु को सुरक्षित रखा। इस चमत्कार ने गुरु को और भी विश्वास दिलाया कि यह बालक साधारण नहीं बल्कि ईश्वर का दूत है।


ओंकारेश्वर से मिली ऊर्जा

ओंकारेश्वर की गुफा में शिक्षा प्राप्त करने के बाद ही शंकराचार्य ने संपूर्ण भारत की यात्रा का संकल्प लिया। उन्होंने चार धामों की स्थापना की, अद्वैत वेदांत का प्रचार किया और सनातन धर्म को एक नई ऊर्जा दी।

ओंकारेश्वर उनके जीवन का वह मोड़ था जहाँ उन्हें गुरु और मार्गदर्शन मिला। यदि यह गुफा और यह स्थान न होता, तो शायद शंकराचार्य की कथा अधूरी रह जाती।


मेरा अनुभव

जब मैंने ओंकारेश्वर की उस गुफा में प्रवेश किया, तो वातावरण में एक अलौकिक शांति महसूस हुई। गुफा छोटी है, लेकिन जैसे ही दीपक की लौ को देखा, लगा कि आज भी शंकराचार्य और उनके गुरु की साधना यहाँ गूँज रही है।

पुजारी जी ने जब यह कथा सुनाई तो मन भीतर तक श्रद्धा से भर गया। यह अनुभव केवल एक यात्रा नहीं बल्कि आत्मा को छू लेने वाला क्षण बन गया।


निष्कर्ष

ओंकारेश्वर केवल ज्योतिर्लिंग का धाम ही नहीं, बल्कि यह स्थान अद्वैत वेदांत और गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक भी है। आदि गुरु शंकराचार्य और गोविंद भगवत्पाद की यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चे मार्गदर्शन और गुरु की शरण में जाकर ही जीवन का सही उद्देश्य प्राप्त होता है।

ओंकारेश्वर की यात्रा हर उस साधक के लिए विशेष है जो आध्यात्मिकता और ज्ञान की तलाश में है।


FAQs

प्रश्न 1: शंकराचार्य को ओंकारेश्वर क्यों आना पड़ा?
उत्तर: शंकराचार्य अपने गुरु की खोज में निकले थे और नर्मदा तट पर स्थित ओंकारेश्वर में उन्हें गोविंद भगवत्पाद मिले।

प्रश्न 2: गोविंद गुफा कहाँ स्थित है?
उत्तर: गोविंद गुफा ओंकारेश्वर मंदिर परिसर में स्थित है, जहाँ आज भी श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं।

प्रश्न 3: शंकराचार्य ने ओंकारेश्वर से क्या सीखा?
उत्तर: उन्होंने वेद, उपनिषद और अद्वैत वेदांत का गहन ज्ञान अपने गुरु से प्राप्त किया।

प्रश्न 4: ओंकारेश्वर की यात्रा का धार्मिक महत्व क्या है?
उत्तर: यह स्थान ज्योतिर्लिंग होने के साथ-साथ गुरु-शिष्य परंपरा और अद्वैत दर्शन की जन्मभूमि भी है।