भगवान ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग धाम की उत्पत्ति की कथा सूर्यवंश के महान और प्रतापी महाराजा मांधाता की कठोर तपस्या और आध्यात्मिक शक्ति (Raja Mandhata Tapasya) से गहराई से जुड़ी हुई है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, राजा मांधाता ने नर्मदा नदी के तट पर स्थित इस ॐ (ओंकार) आकृति वाले पावन पर्वत पर बैठकर हजारों वर्षों तक भगवान भोलेनाथ की घोर तपस्या की थी। उनकी निश्छल भक्ति और अपार आध्यात्मिक शक्ति से प्रसन्न होकर देवाधिदेव महादेव ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिए और श्रद्धालुओं के कल्याण हेतु ज्योतिर्लिंग रूप में इसी पर्वत पर विराजमान होने का वरदान दिया।
📜 राजा मांधाता व पौराणिक महत्व: एक नज़र में (Quick Facts)
महाराजा मांधाता और ओंकारेश्वर धाम से जुड़े मुख्य पौराणिक तथ्य:
📌 राजा मांधाता की कथा के 3 मुख्य पहलू (Key Highlights)
राजा मांधाता ने समस्त सुख-सुविधाओं का त्याग कर नर्मदा जी के टापू पर भगवान शिव की निराहार और अखंड साधना की थी।
शिवजी ने राजा मांधाता की भक्ति से प्रसन्न होकर ओंकारेश्वर (प्रणव) रूप में पार्थिव लिंग पर निवास स्वीकार किया।
राजा के नाम पर ही इस द्वीप का नाम ‘मांधाता’ पड़ा। आज भी श्रद्धालु 7 किमी की मांधाता पर्वत परिक्रमा कर पुण्य अर्जित करते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)
मांधाता पर्वत की परिक्रमा लगभग 7 किलोमीटर लंबी है। इसे पैदल पूरा करने में श्रद्धालुओं को 2 से 3 घंटे का समय लगता है।
सबसे नजदीकी एयरपोर्ट इंदौर (देवी अहिल्याबाई होल्कर एयरपोर्ट) है जो लगभग 75 किमी दूर है। प्रमुख रेलवे स्टेशन भी इंदौर जंक्शन ही है, जहाँ से ओंकारेश्वर के लिए आसानी से कैब मिल जाती है।



