शिव पुराण एवं सनातन परंपरा के अनुसार, चौथे ज्योतिर्लिंग की यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक भक्त श्री ओंकारेश्वर और श्री ममलेश्वर (अमलेश्वर) दोनों के दर्शन न कर लें। नर्मदा नदी के दक्षिणी तट पर स्थित ममलेश्वर मंदिर प्राचीन स्थापत्य कला और असीम आध्यात्मिक शांति का अद्भुत उदाहरण है।
जहाँ मानधाता द्वीप पर स्थित ओंकारेश्वर मंदिर ‘प्रणव (ॐ)’ का प्रतीक है, वहीं मुख्य भूमि पर स्थित ममलेश्वर मंदिर पार्थिव पूजन और प्राचीन अखंड ज्योति का पावन केंद्र है। इस लेख में जानिए ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास, दर्शन समय, और दर्शन की संपूर्ण विधि।
⏰ ममलेश्वर मंदिर दर्शन एवं आरती समय (Daily Timings)
ममलेश्वर मंदिर की दैनिक पूजा एवं आरती सारणी:
📜 ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग का पौराणिक इतिहास एवं कथा
शिव पुराण के अनुसार, नारद जी के कहने पर जब विंध्याचल पर्वत ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की, तब भगवान शिव प्रकट हुए। ऋषियों और देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव दो भागों में विभक्त हो गए:
- ओंकारेश्वर: जो मानधाता द्वीप पर ॐ के आकार में विराजमान हुए (पार्थिव रूप)।
- ममलेश्वर (अमलेश्वर): जो नर्मदा के मुख्य दक्षिणी तट पर ‘अमलेश्वर’ (देवताओं के ईश्वर) के रूप में स्थापित हुए।
मान्यता है कि प्राचीन काल से यहाँ 1000 पार्थिव शिवलिंग बनाकर प्रतिदिन रुद्राभिषेक करने की दिव्य परंपरा चली आ रही है।
🚶♂️ ओंकारेश्वर मुख्य मंदिर से ममलेश्वर कैसे जाएँ?
- झूला पुल द्वारा (Hanging Bridge): ओंकारेश्वर मंदिर से दर्शन कर बाहर आने के बाद आप झूला पुल पैदल पार करके सीधे ममलेश्वर मंदिर प्रांगण पहुँच सकते हैं (लगभग 10-15 मिनट पैदल)।
- नाव (Boat Ride) द्वारा: आप कोटितीर्थ घाट से नाव लेकर दक्षिणी तट (ममलेश्वर घाट) पहुँच सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)
नहीं, ममलेश्वर मंदिर में सामान्य दर्शन पूर्णतः निःशुल्क हैं। विशेष पूजन या अभिषेक हेतु मंदिर समिति के नियमानुसार शुल्क लागू होता है।
हाँ, ममलेश्वर मंदिर प्रांगण में विद्वान आचार्यों द्वारा पंडित जी के माध्यम से रुद्राभिषेक एवं पार्थिव शिवपूजन विशेष रूप से करवाया जाता है।



