पवित्र नर्मदा नदी के मध्य ‘ॐ’ के आकार में बसे मांधाता द्वीप पर विराजमान ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग (Omkareshwar Jyotirlinga) का सनातन धर्म में अत्यंत महिमामयी स्थान है।
यह पावन धाम न केवल 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है, बल्कि इसके साथ कई अद्भुत पौराणिक कथाएं, रहस्य और गूढ़ धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। राजा मांधाता की तपस्या से लेकर विंध्याचल पर्वत के अभिमान-भंग और शिव-पार्वती के रात्रिकालीन विश्राम तक, आइए जानते हैं ओंकारेश्वर के अलौकिक इतिहास और मान्यताओं के बारे में।
📜 ओंकारेश्वर: पौराणिक कथाएं व मान्यताएं (Quick Facts)
ओंकारेश्वर धाम से जुड़े मुख्य पौराणिक प्रसंग और तथ्य:
📌 ओंकारेश्वर की 3 प्रमुख पौराणिक मान्यताएं (Key Beliefs)
नारद मुनि के उकसाने पर विंध्याचल ने पार्थिव शिवलिंग बनाकर कठोर तपस्या की। प्रसन्न होकर शिवजी दो रूपों (ओंकारेश्वर-ममलेश्वर) में प्रकट हुए।
सूर्यवंशी सम्राट मांधाता ने पर्वत पर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया। इसीलिए इस पर्वत को ‘मांधाता पर्वत’ कहा जाता है।
शयन आरती के बाद मंदिर में चौपड़-पासे सजाए जाते हैं। माना जाता है कि रात्रि में शिव-पार्वती विश्राम व क्रीड़ा हेतु यहाँ पधारते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)
हाँ, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ओंकारेश्वर और ममलेश्वर दोनों एक ही ज्योतिर्लिंग के दो स्वरूप हैं। दोनों मंदिरों के दर्शन करने से ही ओंकारेश्वर यात्रा पूर्ण और फलदायी मानी जाती है।
ओंकारेश्वर मंदिर में रात्रि शयन आरती सामान्यतः रात्रि 8:30 बजे से 9:00 बजे के आसपास होती है, जिसके पश्चात् भगवान के विश्राम के लिए चौपड़-पासे सजाए जाते हैं।



