सनातन धर्म के पुनरुद्धारक और अद्वैत वेदांत के महान प्रवर्तक आदिगुरु शंकराचार्य (Adiguru Shankaracharya and Omkareshwar) का ओंकारेश्वर की पावन भूमि से अत्यंत गहन और ऐतिहासिक आध्यात्मिक संबंध है।
केरल के कालड़ी गांव से पदयात्रा करते हुए बाल संन्यासी शंकराचार्य ओंकारेश्वर पहुँचे थे। यही वह पवित्र स्थान है जहाँ उन्हें अपने गुरु स्वामी गोविंदपाद मिले, संन्यास दीक्षा प्राप्त हुई और उन्होंने प्रसिद्ध ‘नर्मदा अष्टकम’ की रचना की।
🚩 आदिगुरु शंकराचार्य और ओंकारेश्वर: एक नज़र में (Snapshot)
शंकराचार्य जी की ओंकारेश्वर ज्ञानयात्रा से जुड़े प्रमुख ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पहलू:
🌟 ओंकारेश्वर में शंकराचार्य जी के 3 मुख्य स्थल (Must-Visit Sites)
मांधाता पहाड़ी पर स्थित 108 फीट ऊंची शंकराचार्य जी की प्रतिमा उनके 12 वर्षीय बाल संन्यासी स्वरूप का अद्भुत प्रतीक है।
ओंकारेश्वर मंदिर परिसर के नीचे स्थित यह वही ऐतिहासिक गुफा है जहाँ स्वामी गोविंदपाद ध्यानमग्न रहते थे और शंकराचार्य ने अध्ययन किया।
अद्वैत वेदांत के प्रचार-प्रसार और भारतीय संस्कृति को प्रदर्शित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर का भव्य सांस्कृतिक परिसर स्थापित किया गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)
ओंकारेश्वर के मांधाता पर्वत पर स्थापित ‘एकात्मता की प्रतिमा’ (Statue of Oneness) की ऊंचाई 108 फीट है। यह प्रतिमा उनके 12 वर्ष की आयु के बाल संन्यासी रूप को दर्शाती है।
ओंकारेश्वर में प्रवास के दौरान आदिगुरु शंकराचार्य जी ने पवित्र नर्मदा नदी की महिमा में सुप्रसिद्ध ‘नर्मदा अष्टकम’ (सबिंदु सिन्धु सुस्खलत्तरंग भंग रंजितम्…) की रचना की थी।



