पवित्र नर्मदा नदी के मध्य ॐ (ओम) के आकार में बसे ओंकारेश्वर द्वीप का पौराणिक इतिहास बेहद अलौकिक है। राजा मानधाता और ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का संबंध (Raja Mandhata Connection with Omkareshwar) सनातन संस्कृति का एक महत्वपूर्ण व पवित्र अध्याय है। सूर्यवंशी इक्ष्वाकु वंश के महान चक्रवर्ती सम्राट राजा मानधाता (जो कि भगवान श्रीराम के पूर्वज थे) ने इसी पावन भूमि पर भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी।
राजा मानधाता की अगाध भक्ति से प्रसन्न होकर देवाधिदेव महादेव ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिए और उनकी प्रार्थना पर ओंकारेश्वर में ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा के लिए स्थापित होना स्वीकार किया। यही कारण है कि इस संपूर्ण पर्वत को ‘मानधाता पर्वत’ के नाम से जाना जाता है।
📜 राजा मानधाता व ओंकारेश्वर: एक नज़र में (Historical & Scriptural Overview)
राजा मानधाता की तपस्या और ओंकारेश्वर धाम से जुड़े मुख्य तथ्य:
🌟 राजा मानधाता और ज्योतिर्लिंग से जुड़े 3 मुख्य पहलू
राजा मानधाता ने वर्षों तक बिना अन्न-जल ग्रहण किए नर्मदा तट पर भगवान भोलेनाथ की तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर शिवजी ज्योति रूप में प्रकट हुए।
सम्राट मानधाता के अलौकिक तप के सम्मान में ही इस संपूर्ण द्वीप और पर्वत श्रृंखला का नाम ‘मानधाता नगरी’ या ‘मानधाता पर्वत’ पड़ा।
आज भी श्रद्धालुओं द्वारा ओंकारेश्वर मंदिर दर्शन के साथ-साथ मानधाता पर्वत की परिक्रमा करना अत्यंत फलदायी और अनिवार्य माना जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)
मानधाता पर्वत की परिक्रमा लगभग 7 किलोमीटर लंबी है, जिसमें रास्ते में कई प्राचीन मंदिर, आश्रम और सुंदर प्राकृतिक व्यू पॉइंट्स आते हैं।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग दो भागों में विभक्त है— एक मानधाता पर्वत पर ‘ओंकारेश्वर’ और दूसरा नर्मदा पार ‘ममलेश्वर’ (अमलेश्वर)। दोनों के दर्शन से ही यात्रा पूर्ण मानी जाती है।



