सनातन संस्कृति और वैदिक ग्रंथों में चतुर्थ ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर (Omkareshwar in Puran) का स्थान अत्यंत उच्च एवं पवित्र माना गया है। शिव पुराण, लिंग पुराण, स्कंद पुराण तथा ब्रह्मवैवर्त पुराण जैसे मुख्य धर्मग्रंथों में ओंकारेश्वर धाम की उत्पत्ति, महिमा और मानधाता पर्वत की अलौकिक गाथा का विशेष वर्णन मिलता है।
समस्त ज्योतिर्लिंगों में केवल ओंकारेश्वर ही ऐसा धाम है जहाँ भगवान भोलेनाथ साक्षात ‘ॐ’ (प्रणव) के स्वरूप में विराजमान हैं। आइए जानते हैं कि प्राचीन भारतीय पुराणों में इस चतुर्थ ज्योतिर्लिंग के संदर्भ में क्या-क्या कथाएँ और मान्यताएँ दर्ज हैं।
📖 प्रमुख पुराणों में ओंकारेश्वर का वर्णन (Puranic References Summary)
विभिन्न धर्मग्रंथों में वर्णित ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के मुख्य संदर्भ:
🌟 पुराणों से जुड़े 3 मुख्य पौराणिक प्रसंग (Core Puranic Legends)
नारद जी द्वारा सुमेरु पर्वत की प्रशंसा सुनने के बाद विंध्याचल ने ओंकारेश्वर में पार्थिव लिंग बनाकर शिवजी की घोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर शिवजी प्रकट हुए।
देवताओं और ऋषियों की प्रार्थना पर मूल स्वरूप ‘ओंकारेश्वर’ (परमेश्वर रूप) तथा दूसरा स्वरूप ‘अमलेश्वर’ (ममलेश्वर) के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
इक्ष्वाकु वंश के चक्रवर्ती सम्राट मानधाता की भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी ने इस पर्वत को उनके नाम से विख्यात होने का आशीर्वाद दिया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)
शिव पुराण के अनुसार जो मनुष्य ओंकारेश्वर और ममलेश्वर के दर्शन कर नर्मदा जल से अभिषेक करता है, उसे सभी पापों से मुक्ति मिलती है और अंत काल में शिवलोक की प्राप्ति होती है।
ममलेश्वर को ‘अमलेश्वर’ भी कहा जाता है। पुराणों के अनुसार, ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का आधा भाग ममलेश्वर है। दोनों स्थानों के दर्शन करने पर ही संपूर्ण ज्योतिर्लिंग दर्शन की यात्रा पूरी मानी जाती है।



